PM CARES Fund पर विवाद क्यों?

PM CARES Fund पर विवाद क्यों?

नई दिल्लीः- PM CARES Fund को लेकर एक बार फिर संसद और सियासी गलियारों में बहस तेज हो गई है। सवाल वही पुराना है- जब दान जनता का है, तो उसकी जवाबदेही आखिर किसकी है?

इसी मुद्दे पर प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने लोकसभा सचिवालय को स्पष्ट कर दिया है कि PM CARES Fund पर संसद में सवाल नहीं पूछे जा सकते। PMO के मुताबिक, PM CARES Fund न तो सरकारी कोष है और न ही किसी सरकारी संस्था के अंतर्गत आता है। सरकार का कहना है कि यह एक Public Charitable Trust है, जो पूरी तरह स्वैच्छिक दान से संचालित होता है। इसी कारण इसे न तो संसदीय निगरानी के दायरे में रखा गया है और न ही सूचना का अधिकार (RTI) कानून के तहत।

सरकार ने तर्क दिया कि, PM CARES Fund का पैसा Consolidated Fund of India का हिस्सा नहीं है और यह किसी भी मंत्रालय या विभाग से जुड़ा हुआ नहीं है। इसी आधार पर सरकार का कहना है कि इसे RTI Act के तहत ‘Public Authority’ नहीं माना जा सकता।

क्या है PM CARES Fund?

आपको बता दे कि PM CARES (Prime Minister’s Citizen Assistance and Relief in Emergency Situations) Fund एक ऐसा राहत कोष है, जो आपदा और आपात स्थितियों में मदद के उद्देश्य से बनाया गया था। इसकी शुरुआत 28 मार्च 2020 को कोविड-19 महामारी के दौरान हुई थी। जब देश एक अभूतपूर्व स्वास्थ्य संकट से जूझ रहा था। सरकार ने आपात स्थितियों में त्वरित राहत और सहायता के उद्देश्य से इस फंड की घोषणा की थी।

सरकार के अनुसार-
  • PM CARES एक सार्वजनिक परोपकारी ट्रस्ट है
  • इसमें धनराशि स्वेच्छा से दान के रूप में आती है
  • यह सरकारी बजट का हिस्सा नहीं है
  •  प्रधानमंत्री इसके पदेन अध्यक्ष हैं, जबकि रक्षा मंत्री, गृह मंत्री और वित्त मंत्री इसके पदेन ट्रस्टी हैं

सरकार का दावा है कि इस फंड से देशभर में ऑक्सीजन संयंत्र स्थापित करने, वेंटिलेटर और अन्य चिकित्सा उपकरणों की खरीद, स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने और आपदा राहत कार्यों में मदद की गई है।

हालांकि, सरकार के इस रुख पर विपक्ष और कई नागरिक संगठनों ने सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि जब ट्रस्ट के ट्रस्टी प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्री हैं, जब सरकारी पदों और प्रतीकों का इस्तेमाल होता है और जब दान देने वालों में आम नागरिकों से लेकर बड़ी कंपनियां तक शामिल हैं, तो इसे पूरी तरह निजी ट्रस्ट कैसे माना जा सकता है।

आलोचकों का तर्क है कि यदि PM CARES Fund पर न संसद सवाल कर सकती है और न ही RTI के जरिए जानकारी मांगी जा सकती है, तो इसकी पारदर्शिता और जवाबदेही कैसे सुनिश्चित होगी।

गौरतलब हैं कि सरकार जहां कानूनी प्रावधानों और ट्रस्ट की संरचना का हवाला देकर अपने फैसले को सही ठहरा रही है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष और सामाजिक संगठनों का कहना है कि लोकतंत्र में जनता का भरोसा पारदर्शिता से ही बनता है।

इसी टकराव ने PM CARES Fund को केवल एक राहत कोष से आगे बढ़ाकर पारदर्शिता बनाम जवाबदेही की बहस का अहम मुद्दा बना दिया है। फिलहाल सरकार अपने रुख पर कायम है, लेकिन सवाल अब भी कायम है- जब दान जनता का है, तो जवाबदेही किसकी है?

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