नई दिल्ली/जयपुरः- होली का त्योहार जहां रंगों और उत्साह के लिए जाना जाता है, वहीं राजस्थान की राजधानी जयपुर में इस पर्व की एक अनोखी परंपरा आज भी जीवित है। यहां सदियों पुरानी ‘गुलाल गोटा’ बनाने की कला न केवल होली को खास बनाती है, बल्कि हिंदू त्योहार और मुस्लिम कारीगरी के सांस्कृतिक संगम की मिसाल भी पेश करती है।
क्या है गुलाल गोटा?
गुलाल गोटा देखने में छोटी गेंद जैसा होता है, जिसका वजन लगभग 4 से 6 ग्राम के बीच होता है। इसे लाख से तैयार किया जाता है और यह इतना नाजुक होता है कि हल्का सा स्पर्श होते ही टूट जाता है। टूटते ही इसके भीतर भरा गुलाल सामने वाले को रंगों से सराबोर कर देता है, वह भी बिना किसी चोट या नुकसान के।
1727 से जुड़ी है परंपराः-
इस शिल्प की शुरुआत 1727 में जयपुर की स्थापना के समय मानी जाती है, जब सवाई जयसिंह द्वितीय ने शहर बसाया था। उसी दौर से मनिहार समुदाय के कारीगर इस कला में पारंगत रहे हैं।
जयपुर के ‘मनिहारों का रास्ता’ क्षेत्र में रहने वाले मुस्लिम मनिहार परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ाते आ रहे हैं। वर्तमान में उनकी सातवीं और आठवीं पीढ़ी इस नाजुक शिल्प को संभाले हुए है, जो सांप्रदायिक सौहार्द और साझा सांस्कृतिक विरासत की प्रतीक है।
कैसे बनता है गुलाल गोटा?
गुलाल गोटा बनाने की प्रक्रिया बेहद सावधानी और कौशल की मांग करती है। सबसे पहले लाख को गर्म कर पिघलाया जाता है। इसके बाद कांच की नली या फूंकनी की सहायता से उसमें हवा भरी जाती है, जिससे वह गेंद का आकार ले सके। हल्की सी चूक पूरी मेहनत को बेकार कर सकती है।
आकार बनने के बाद उसमें खुशबूदार गुलाल भरा जाता है और कागज या अरारोट के लेप से उसे सील कर दिया जाता है। यह पूरी तरह पारंपरिक और हस्तनिर्मित प्रक्रिया है।
राजघराने से जुड़ी रही परंपराः-
आपको बता दे कि शुरुआती दौर में गुलाल गोटे खास तौर पर राजघराने के लिए तैयार किए जाते थे। होली के अवसर पर राजा हाथी पर सवार होकर जनता के बीच गुलाल गोटे फेंकते थे। समय के साथ राजशाही का स्वरूप बदला, लेकिन यह परंपरा समाप्त नहीं हुई।
आज भी जयपुर के सिटी पैलेस में होली के अवसर पर गुलाल गोटों की विशेष मांग रहती है।
ईको-फ्रेंडली और सुरक्षितः-
विशेषज्ञों के अनुसार, गुलाल गोटे पूरी तरह पर्यावरण अनुकूल होते हैं। शुद्ध लाख और प्राकृतिक रंगों से बनाए जाने के कारण ये किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाते।
इस तरह जयपुर की गुलाल गोटा परंपरा न केवल होली के रंगों को और खास बनाती है, बल्कि सदियों पुरानी सांस्कृतिक एकता और कारीगरी की विरासत को भी जीवित रखे हुए है।