केरलः- 4 मार्च को देशभर में होली का पर्व धूमधाम से मनाया जाएगा। बाजार रंगों, गुलाल और पिचकारियों से सजे हुए हैं। हालांकि, भारत के दक्षिणी राज्य केरल में होली का स्वरूप कुछ अलग और पारंपरिक है। यहां रंगों की जगह हल्दी के पवित्र रंग के साथ ‘मंजल कुली’ उत्सव मनाया जाता है।
होली नहीं, ‘मंजल कुली’ की परंपराः-
आपको बता दे कि केरल में होली को ‘मंजल कुली’ के रूप में मनाया जाता है, जिसकी शुरुआत पूर्णिमा से होती है और यह चार दिनों तक चलता है। इस उत्सव में पारंपरिक रंगों का उपयोग नहीं किया जाता, बल्कि हल्दी के पानी और लेप से अनुष्ठान किए जाते हैं।
यह आयोजन विशेष रूप से केरल के गोश्रीपुरम तिरुमाला मंदिर में होता है। यह मंदिर गौड़ा सारस्वत ब्राह्मण समुदाय से जुड़ा है, जो इस परंपरा को पीढ़ियों से निभाता आ रहा है।
चार दिनों का आध्यात्मिक आयोजनः-
इस उत्सव के पहले दिन मंदिर में सुख-समृद्धि से जुड़ी वस्तुओं का दान किया जाता है। श्रद्धालु भगवान को नारियल, नारियल तेल, हल्दी, कुमकुम समेत कई सामग्री अर्पित करते हैं।
दूसरे दिन मंदिर में हल्दी का लेप तैयार किया जाता है, जिसे भक्त अपने शरीर पर लगाते हैं। मान्यता है कि इससे बदलती ऋतु का प्रभाव कम होता है और शारीरिक व मानसिक शुद्धता प्राप्त होती है। जो लोग लेप नहीं लगाते, वे हल्दी के पानी से स्नान करते हैं।
तीसरे दिन ‘रंग पंचमी’ का आयोजन होता है। इस अवसर पर लोग एक-दूसरे को हल्दी युक्त रंग लगाकर भाईचारे और प्रेम का संदेश देते हैं। इस दिन विभिन्न समुदायों के लोग भी उत्सव में भाग लेते हैं।
चौथे और अंतिम दिन मंदिर परिसर में सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता है। पहले भगवान को भोग लगाया जाता है, इसके बाद श्रद्धालु मिलकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। यह दिन अन्न के महत्व और सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है।
सामाजिक सद्भाव का संदेशः-
मंजल कुली उत्सव का उद्देश्य केवल शारीरिक और मानसिक शुद्धि नहीं, बल्कि सामाजिक सद्भाव और सामुदायिक एकता को बढ़ावा देना भी है। इस दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जिनमें केरल की पारंपरिक कला और संस्कृति की झलक देखने को मिलती है।
इस तरह, जहां देश के अधिकांश हिस्सों में होली रंगों के साथ मनाई जाती है, वहीं केरल में यह पर्व आध्यात्मिकता, परंपरा और सामूहिक सौहार्द का संदेश देता है।