संसद का शोर, जनता का खर्च: हर घंटे ₹1.5 करोड़ का नुकसान

संसद का शोर, जनता का खर्च: हर घंटे ₹1.5 करोड़ का नुकसान

नई दिल्लीः-  भारतीय संसद देश के लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच है। यहीं कानून बनते हैं, सरकार से सवाल पूछे जाते हैं और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर बहस होती है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में संसद की छवि एक गंभीर विधायी संस्था से अधिक एक ऐसे मंच की बनती जा रही है, जहाँ बहस से ज़्यादा हंगामा दिखाई देता है। इस शोर की कीमत बहुत भारी है और वह कीमत हर घंटे आम करदाता चुका रहा है।

आंकड़ों के अनुसार, संसद के दोनों सदनों के एक घंटे के संचालन पर लगभग ₹1.5 करोड़ का खर्च आता है। इसमें सांसदों के वेतन और भत्ते, हजारों कर्मचारियों का वेतन, सुरक्षा व्यवस्था, संसद भवन का रखरखाव, बिजली-पानी, प्रशासनिक और तकनीकी खर्च शामिल हैं। संसद में काम हो या न हो, यह खर्च तय है। यानी जैसे ही सदन की घंटी बजती है, टैक्सपेयर्स की जेब से पैसा निकलना शुरू हो जाता है।

समस्या तब गंभीर हो जाती है जब यह महंगा समय सार्थक चर्चा के बजाय नारेबाज़ी, वेल में आना, और बार-बार स्थगन में नष्ट हो जाता है। कई सत्रों में देखा गया है कि संसद की तय कार्यवाही का बड़ा हिस्सा बिना किसी विधायी काम के ही समाप्त हो जाता है। हर ऐसा घंटा न सिर्फ लोकतंत्र की विफलता है, बल्कि जनता के पैसे की खुली बर्बादी भी है।

इस स्थिति के लिए केवल एक पक्ष को दोषी ठहराना ईमानदारी नहीं होगी। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की भूमिका सवालों के घेरे में है। सरकार पर आरोप लगता है कि वह कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पर्याप्त बहस के बिना पारित कराना चाहती है। वहीं विपक्ष, सरकार को घेरने के नाम पर अक्सर सदन को ही ठप कर देता है। विरोध लोकतंत्र का अहम हिस्सा है, लेकिन जब विरोध चर्चा को ही खत्म कर दे, तो उसका नुकसान जनता को उठाना पड़ता है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि सांसद कोई स्वैच्छिक सेवा नहीं दे रहे हैं। उन्हें नियमित वेतन, दैनिक भत्ता, कार्यालय और निर्वाचन क्षेत्र भत्ता, यात्रा सुविधाएँ, दिल्ली में आवास और पेंशन जैसी सुविधाएँ मिलती हैं। ये सुविधाएँ इस उम्मीद पर दी जाती हैं कि सांसद गंभीरता से विधायी कार्य करेंगे। जब संसद बार-बार बाधित होती है, तो यह स्थिति “उपस्थिति तो है, पर प्रदर्शन नहीं” जैसी बन जाती है और उसका बोझ सीधे करदाताओं पर पड़ता है।

आर्थिक नुकसान से भी अधिक खतरनाक है इसका लोकतांत्रिक नुकसान। जब संसद में बहस नहीं होती, तो कानूनों की गहन जांच नहीं हो पाती। नीतियाँ बिना पर्याप्त विमर्श के लागू हो जाती हैं या फिर जरूरी फैसले टलते रहते हैं। इससे न केवल कानूनों की गुणवत्ता प्रभावित होती है, बल्कि जनता का लोकतंत्र पर भरोसा भी कमजोर पड़ता है।

अक्सर तर्क दिया जाता है कि जब सरकार विपक्ष की बात नहीं सुनती, तो विरोध के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। लेकिन संसद को ठप कर देना कार्यपालिका पर नहीं, बल्कि जनता पर दबाव डालता है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में असहमति का समाधान संवाद से होना चाहिए, अवरोध से नहीं।

अब समय आ गया है कि संसद की कार्यप्रणाली में गंभीर सुधार हों। सदन के नियमों का सख्ती से पालन, विधेयकों पर न्यूनतम बहस समय तय करना, संसदीय समितियों को अधिक सशक्त बनाना और सांसदों की जवाबदेही तय करना ये सभी कदम आवश्यक हैं। यहां तक कि कुछ भत्तों को उपस्थिति और भागीदारी से जोड़ने पर भी विचार किया जाना चाहिए।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन जब संसद हर घंटे ₹1.5 करोड़ खर्च करती है, तो जनता को यह उम्मीद करने का पूरा अधिकार है कि उसे शोर नहीं, समाधान मिले।

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