नई दिल्ली:- संसद के बजट सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव 22 साल बाद एक असाधारण परिस्थिति में पारित हो गया। वर्ष 2004 के बाद यह पहली बार हुआ है जब धन्यवाद प्रस्ताव प्रधानमंत्री के भाषण के बिना ही पारित किया गया। आम तौर पर इस बहस का समापन प्रधानमंत्री के जवाब से होता है, जिसे संसदीय परंपरा का अहम हिस्सा माना जाता है।
गौरतलब है कि लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान कई दिनों तक कार्यवाही चली, लेकिन विपक्ष के लगातार विरोध, नारेबाजी और वेल में आने के कारण सदन बार-बार बाधित होता रहा। कई बार स्थगन के बावजूद जब स्थिति सामान्य नहीं हो सकी, तो सरकार ने प्रस्ताव को बिना प्रधानमंत्री के जवाब के ही पारित कराने का फैसला किया।
संसदीय इतिहास में इससे पहले ऐसा 10 जून 2004 को हुआ था। उस समय भी विपक्ष के तीखे विरोध के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर अपना जवाब नहीं दे पाए थे। उस घटना के बाद पहली बार अब यह स्थिति दोहराई गई है।
धन्यवाद प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री का भाषण आमतौर पर सरकार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसी मंच से सरकार राष्ट्रपति के अभिभाषण में रखी गई नीतियों, उपलब्धियों और भविष्य की प्राथमिकताओं पर विस्तार से अपना पक्ष रखती है। साथ ही, विपक्ष द्वारा उठाए गए सवालों और आरोपों का जवाब देने का भी यह सबसे बड़ा अवसर होता है।
इस बार विपक्ष ने महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याओं, संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश की। वहीं, सत्ता पक्ष ने विपक्ष पर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को बाधित करने और सदन की गरिमा को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाया।
संसद के सूत्रों के अनुसार, लगातार गतिरोध के कारण सदन का काफी समय बर्बाद हुआ और कई अहम विधायी कार्य प्रभावित हुए। इसके बावजूद सरकार ने संवैधानिक प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव को पारित कराया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री के बिना धन्यवाद प्रस्ताव का पारित होना न केवल दुर्लभ है, बल्कि यह संसद में बढ़ते टकराव और संवाद की कमी को भी दर्शाता है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।
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