नई दिल्लीः- यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (UGC) ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से वर्ष 2026 के लिए नए नियम अधिसूचित किए हैं। इन नियमों का नाम ‘Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026’ रखा गया है। नए प्रावधानों के तहत देश की सभी यूनिवर्सिटियों और कॉलेजों में इक्विटी कमेटी का गठन अनिवार्य कर दिया गया है, जो अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों से जुड़ी शिकायतों की सुनवाई करेगी और तय समय सीमा में उनका निपटारा सुनिश्चित करेगी।
UGC के अनुसार, इस इक्विटी कमेटी में SC-ST, OBC, दिव्यांग और महिला प्रतिनिधियों की मौजूदगी अनिवार्य होगी। इस कमेटी का उद्देश्य कैंपस में समानता और समावेशी माहौल बनाना तथा वंचित और पिछड़े वर्गों के छात्रों के लिए कल्याणकारी योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बने नियमः-
आपको बताते चले कि, UGC ने यह नियम सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बनाए हैं। वर्ष 2025 में रोहित वेमुला और पायल तड़वी मामलों की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने UGC को आठ सप्ताह के भीतर सख्त और प्रभावी नियम बनाने का निर्देश दिया था।
हैदराबाद यूनिवर्सिटी के शोध छात्र रोहित वेमुला और मुंबई के एक मेडिकल कॉलेज की छात्रा पायल तड़वी ने कथित जातिगत उत्पीड़न के बाद आत्महत्या कर ली थी। इन मामलों में पीड़ित छात्रों की माताओं द्वारा जनहित याचिकाएं (PIL) दाखिल की गई थीं। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने 2012 के पुराने नियमों को अपर्याप्त बताते हुए उन्हें तत्काल अपडेट करने को कहा था।
UGC की रिपोर्ट में सामने आए आंकड़ेः-
UGC द्वारा सुप्रीम कोर्ट और संसद की समितियों को सौंपी गई रिपोर्ट में उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव की बढ़ती शिकायतों का खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2017-18 में ऐसी 173 शिकायतें दर्ज की गई थीं, जो 2023-24 में बढ़कर 378 हो गईं। यानी पांच वर्षों में शिकायतों में 118.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
हालांकि, UGC का कहना है कि 90 प्रतिशत से अधिक मामलों का निपटारा किया गया, लेकिन लंबित मामलों की संख्या भी बढ़ी है। वर्ष 2019-20 में जहां 18 मामले लंबित थे, वहीं 2023-24 में यह संख्या बढ़कर 108 हो गई।
जातिगत भेदभाव की स्पष्ट परिभाषाः-
आपको बता दें कि इन नए नियमों में पहली बार जातिगत भेदभाव को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है। SC, ST और OBC छात्रों के खिलाफ किसी भी प्रकार का प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष या अपमानजनक व्यवहार भेदभाव की श्रेणी में आएगा। किसी छात्र की गरिमा को ठेस पहुंचाने या शिक्षा में समान अवसर को प्रभावित करने वाली किसी भी कार्रवाई पर सख्त कार्रवाई का प्रावधान किया गया है।
फिर इस पर विरोध और विवाद क्यों ?
इन नए नियमों को लेकर देशभर में विवाद भी खड़ा हो गया है। देश में सवर्ण यानी जनरल कैटेगरी के कुछ छात्र और संगठन इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका आरोप है कि ये नियम एकतरफा हैं, क्योंकि इनमें केवल SC, ST और OBC छात्रों के खिलाफ भेदभाव को ही परिभाषित किया गया है, जबकि जनरल कैटेगरी के छात्रों को इसमें भेदभाव का शिकार मानने का कोई प्रावधान नहीं है।
उनका कहना हैं कि सवर्ण यानी जनरल कैटेगरी को पहले से ही शोषक वर्ग माना जा रहा है, इसलिए जनरल कैटेगरी के छात्रों को इसमें भेदभाव का शिकार मानने का कोई प्रावधान ही नहीं है।
विरोध कर रहे संगठनों का कहना है कि इन नियमों का दुरुपयोग कर झूठी शिकायतों के जरिए सवर्ण छात्रों को फंसाया जा सकता है। इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दाखिल की गई है, जिसमें दावा किया गया है कि ये नियम UGC अधिनियम और उच्च शिक्षा में समान अवसर की भावना के खिलाफ हैं।
कुल मिलाकर मामला क्या है ?
UGC का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और बढ़ती शिकायतों के आंकड़ों को देखते हुए इक्विटी कमेटी का गठन जरूरी हो गया था। वहीं, जनरल कैटेगरी के छात्रों को आशंका है कि ये नियम उनके खिलाफ इस्तेमाल हो सकते हैं। ऐसे में विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जहां एक ओर दलित और पिछड़े वर्ग के छात्रों की सुरक्षा को लेकर संतोष है, वहीं दूसरी ओर नियमों के संभावित दुरुपयोग को लेकर विरोध भी तेज हो गया है। फिलहाल यह मामला सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है।
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