कोलकाता, June 4, (Political Insight) : पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सामने राजनीतिक संकट गहराता जा रहा है। पार्टी से अलग हुए 60 विधायकों ने बुधवार को विधानसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर समर्थन पत्र सौंपा और ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता (LoP) घोषित करने का अनुरोध किया। इसके बाद देर रात विधानसभा अध्यक्ष ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दे दी। साथ ही विपक्ष के नेता के लिए निर्धारित कक्ष भी आधिकारिक रूप से उन्हें आवंटित कर दिया गया। हालांकि, ममता बनर्जी ने स्पीकर के इस फैसले को चुनौती देने का ऐलान किया है।
TMC का मतलब ही ममता बनर्जी: कुणाल घोष
इस घटनाक्रम के बाद TMC नेता कुणाल घोष की प्रतिक्रिया भी सामने आई। उन्होंने कहा कि “टीएमसी का मतलब ममता बनर्जी है और ममता बनर्जी का मतलब ही टीएमसी है। पार्टी के सभी कार्यकर्ता दीदी के साथ खड़े हैं। कुछ लोगों ने टीएमसी के चुनाव चिह्न और ममता बनर्जी की छवि के सहारे चुनाव जीता, लेकिन अब वे दूसरे खेमे के प्रभाव में आ गए हैं। ये लोग निर्दलीय नहीं, बल्कि TMC के ही विधायक हैं। यदि वे वास्तव में ममता बनर्जी का सम्मान करते हैं, तो फिर शोभनदेव चट्टोपाध्याय को स्वीकार क्यों नहीं कर पा रहे हैं?”
क्या बोले कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी?
वहीं, कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने दावा किया कि TMC के बागी विधायक भाजपा में शामिल होना चाहते थे, लेकिन BJP ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि भाजपा अपनी छवि को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहती। अधीर रंजन ने आरोप लगाया कि भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे इन विधायकों के पास BJP के सामने समर्पण करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। उन्होंने इस घटनाक्रम की तुलना ममता बनर्जी के कांग्रेस छोड़ने से करते हुए कहा कि बंगाल में अब “एकनाथ शिंदे मॉडल” लागू किया जा रहा है। साथ ही उन्होंने TMC के असंतुष्ट कार्यकर्ताओं को कांग्रेस में शामिल होने का न्योता भी दिया।
क्या था पूरा मामला, क्यों पड़ी TMC में फूट?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, TMC में बगावत की शुरुआत 1 जून को विधायक ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा के निष्कासन के बाद हुई। पार्टी ने दोनों नेताओं पर “पार्टी विरोधी गतिविधियों” में शामिल होने का आरोप लगाया था। इसके बाद असंतुष्ट विधायकों का एक गुट खुलकर उनके समर्थन में सामने आ गया। मामला तब और बढ़ गया, जब 60 विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को विधायक दल का नेता और नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने के समर्थन में विधानसभा अध्यक्ष को पत्र सौंप दिया। इसके साथ ही पार्टी के भीतर नेतृत्व, संगठन और उत्तराधिकार को लेकर लंबे समय से चल रही नाराजगी भी खुलकर सामने आ गई।