मध्य प्रदेश/इंदौर:- इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी से फैली बीमारी और मौतों के बीच मध्य प्रदेश की राजनीति गरमा गई है। राज्य के शहरी विकास एवं आवास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें वे जल संकट पर सवाल पूछ रहे एक टीवी रिपोर्टर के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल करते नजर आ रहे हैं। इस घटना के बाद विपक्षी कांग्रेस ने तीखा हमला बोलते हुए मंत्री के इस्तीफे की मांग की है।
क्या है पूरा मामला?
आपको बता दे कि, यह घटना बुधवार देर रात की है। मंत्री कैलाश विजयवर्गीय इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में डायरिया फैलने की स्थिति का जायजा लेने के बाद मीडिया से बातचीत कर रहे थे। इसी दौरान एक न्यूज चैनल के रिपोर्टर ने उनसे सवाल किया कि दूषित पानी से बीमार हुए लोगों को निजी अस्पतालों में भर्ती कराया गया, लेकिन उनके इलाज के बिलों का भुगतान क्यों नहीं किया गया। साथ ही साफ पानी की व्यवस्था अब तक पूरी तरह दुरुस्त क्यों नहीं हो पाई।
यह सवाल सुनते ही मंत्री नाराज हो गए। समर्थकों की मौजूदगी में उन्होंने रिपोर्टर को “फोकट सवाल” न करने की नसीहत दी। जब रिपोर्टर ने जवाब देने पर जोर दिया, तो मंत्री ने झुंझलाहट में आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल किया। यह पूरा दृश्य कैमरे में कैद हो गया और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया।
कांग्रेस का हमला, इस्तीफे की मांग
वीडियो सामने आने के बाद कांग्रेस ने इसे प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला बताते हुए मंत्री पर गंभीर आरोप लगाए। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि जब आम जनता दूषित पानी से जान गंवा रही है और सैकड़ों लोग बीमार हैं, तब सवाल पूछना पत्रकार का अधिकार और कर्तव्य है। ऐसे में मंत्री का इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करना न केवल असंवेदनशील है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ भी है। पार्टी ने मुख्यमंत्री से मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को पद से हटाने की मांग की है।
विवाद बढ़ने के बीच मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने भागीरथपुरा में जहरीले पानी से हुई घटनाओं को लेकर स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की है। उन्होंने कहा कि इलाके में पानी की समस्या को तुरंत ठीक करने के निर्देश दे दिए गए हैं। मंत्री के अनुसार, अब तक 200 से अधिक लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जबकि कुल संक्रमितों की संख्या करीब 1400 बताई जा रही है। उन्होंने यह भी दावा किया कि फिलहाल कोई भी मरीज गंभीर हालत में नहीं है और सभी को बेहतर इलाज उपलब्ध कराया जा रहा है।
यह मामला सिर्फ एक विवादित बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे सरकार की आपदा प्रबंधन और जवाबदेही पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। दूषित पानी से मौतें और सैकड़ों लोगों का बीमार होना प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा करता है। ऐसे समय में मंत्री का आक्रामक रवैया और पत्रकार के प्रति आपत्तिजनक भाषा जनता के आक्रोश को और बढ़ा सकती है। विपक्ष इसे मुद्दा बनाकर सरकार को घेरने की कोशिश में है, जबकि सत्तारूढ़ पक्ष के लिए यह संकट प्रबंधन और छवि सुधार की बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार इस मामले में क्या कदम उठाती है—क्या सिर्फ सफाई देकर मामला शांत किया जाएगा या फिर प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई भी देखने को मिलेगी।