मध्य प्रदेश/इंदौरः- देश के स्वच्छतम शहर का तमगा पाने वाले इंदौर में जल आपूर्ति व्यवस्था की गंभीर खामियां उजागर हुई हैं। शहर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पेयजल आपूर्ति के चलते भीषण स्वास्थ्य संकट पैदा हो गया है। यह संकट किसी एक दिन की चूक नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही लापरवाही, गलत निर्माण और निगरानी के अभाव का नतीजा बताया जा रहा है। अब तक इस घटना में 15 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 2800 से अधिक लोग बीमार पड़ चुके हैं। विभिन्न अस्पतालों में अभी भी 201 मरीजों का इलाज जारी है।
स्थानीय निवासियों के अनुसार, पिछले कई हफ्तों से क्षेत्र में बदबूदार और गंदे पानी की आपूर्ति हो रही थी। लोगों ने इसकी शिकायत नगर निगम और संबंधित अधिकारियों से की, लेकिन समय रहते कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। हालात 29 दिसंबर 2025 को तब बेकाबू हो गए, जब अचानक 100 से अधिक लोग उल्टी-दस्त, पेट दर्द और बुखार की शिकायत के साथ बीमार पड़ गए। देखते ही देखते अस्पतालों में मरीजों की भीड़ लग गई।
अगले दिन 30 दिसंबर को स्थिति और गंभीर हो गई। एक ही दिन में आठ मरीजों की मौत की खबर सामने आई, जबकि बीमार लोगों की संख्या 1100 से अधिक पहुंच गई। हालात की गंभीरता को देखते हुए नगर निगम ने आनन-फानन में जल आपूर्ति बंद कराई और पानी के सैंपल जांच के लिए प्रयोगशाला भेजे गए।
प्रारंभिक जांच में खुलासा हुआ कि नर्मदा जल लाइन के ऊपर और आसपास ड्रेनेज चैंबर बनाए गए थे। इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह सामने आया कि एक पुलिस चौकी का टॉयलेट भी इसी पेयजल पाइपलाइन के ऊपर बना हुआ था। आशंका है कि इसी कारण सीवेज का पानी रिसकर नर्मदा जल लाइन में मिल गया और लोगों तक मल-मूत्र मिश्रित पानी पहुंचा।
मामले में लापरवाही सामने आने के बाद प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए दो अधिकारियों को निलंबित कर दिया, जबकि एक अधिकारी की सेवा समाप्त कर दी गई। वहीं, जल आपूर्ति और ड्रेनेज व्यवस्था की व्यापक जांच के आदेश दिए गए हैं।
हाई कोर्ट और मानवाधिकार आयोग सख्त
इस घटना की गंभीरता को देखते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए शासन से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। वहीं, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी मुख्य सचिव को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। हाई कोर्ट में पेश की गई स्टेटस रिपोर्ट में सरकार ने जितनी मौतें आधिकारिक रूप से स्वीकार की हैं, वास्तविक आंकड़ा उससे कहीं अधिक बताया जा रहा है।
आपको बता दे कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इंदौर पहुंचकर प्रभावित क्षेत्रों और अस्पतालों का दौरा किया तथा अधिकारियों के साथ आपात बैठक की। उन्होंने मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की। साथ ही दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया।
इसी बीच नगरीय विकास एवं आवास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का एक आपत्तिजनक बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिससे सरकार की तीखी आलोचना हुई। बाद में मंत्री ने अपने बयान पर खेद प्रकट किया, लेकिन तब तक सरकार की काफी किरकिरी हो चुकी थी।
जांच रिपोर्ट ने खोली भयावह सच्चाईः-
नए साल के पहले दिन आई जल जांच रिपोर्ट ने पूरे मामले की भयावहता उजागर कर दी। रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से पुष्टि हुई कि भागीरथपुरा क्षेत्र के लोग लंबे समय तक मल-मूत्र से दूषित पानी पीने को मजबूर थे, जिससे यह गंभीर स्वास्थ्य संकट पैदा हुआ।
जल व्यवस्था पर उठे बड़े सवाल
इस घटना ने इंदौर की जल आपूर्ति, सीवेज प्रबंधन और निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते शिकायतों पर ध्यान दिया गया होता और निर्माण मानकों का पालन किया गया होता, तो इतने बड़े जनहानि और स्वास्थ्य संकट से बचा जा सकता था। अब देखना यह है कि जांच के बाद दोषियों पर कितनी सख्त कार्रवाई होती है और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।