राष्ट्रपति ने ‘शांति विधेयक, 2025’ को दी मंज़ूरी

राष्ट्रपति ने ‘शांति विधेयक, 2025’ को दी मंज़ूरी

ई दिल्लीः- राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने संसद के शीतकालीन सत्र में पारित ‘सतत परमाणु ऊर्जा उपयोग और विकास (भारत रूपांतरण) विधेयक, 2025’, जिसे शांति विधेयक कहा जा रहा है, को स्वीकृति प्रदान कर दी है। राष्ट्रपति ने बुधवार को इस विधेयक को मंज़ूरी दी, जिसके साथ ही यह कानून के रूप में लागू हो गया है।

सरकार के अनुसार, यह विधेयक भारत के नागरिक परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में व्यापक सुधारों की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। इसका उद्देश्य परमाणु ऊर्जा के सुरक्षित, सतत और शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देना तथा देश की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए इस क्षेत्र को अधिक सक्षम बनाना है।

पुराने कानूनों की सीमाएं: गहन विश्लेषण

परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962: यह कानून स्वतंत्रता के बाद परमाणु कार्यक्रम की शुरुआत (भाभा समिति) से प्रेरित था। इसमें केवल सरकारी संस्थाओं (NPCIL, BARC) को अधिकार था, जिससे निजी निवेश शून्य रहा। परिणामस्वरूप, भारत के 22 कार्यरत रिएक्टरों की कुल क्षमता मात्र 7,480 मेगावाट है, जबकि चीन के पास 58 रिएक्टर (55,000+ MW) हैं।

नागरिक परमाणु क्षति दायित्व अधिनियम, 2010: सिविल लायबिलिटी एक्ट ने ऑपरेटर की दायित्व सीमा ₹1,500 करोड़ तय की, जो अंतरराष्ट्रीय CLC (Convention on Civil Liability) से कठोर था। इससे अमेरिका-भारत परमाणु समझौते (2008) के बावजूद रिएक्टर आपूर्ति रुकी रही। शांति विधेयक इसकी जगह उदार प्रावधान लाता है।

अपेक्षित प्रभाव और आंकड़े

  • ऊर्जा लक्ष्य: वर्तमान 7,480 MW से 2030 तक 22,000 MW और 2047 तक 100 GW का लक्ष्य। निजी निवेश से ₹5-7 लाख करोड़ की पूंजी आकर्षित होगी
  • आर्थिक लाभ: 5 लाख प्रत्यक्ष रोजगार, आपूर्ति श्रृंखला में 20 लाख अप्रत्यक्ष नौकरियां। निर्यात अवसर (थोरियम तकनीक) से $10 बिलियन राजस्व।
  • ग्रिड स्थिरता: परमाणु ऊर्जा 3% से बढ़कर 9% (2047 तक), कोयला निर्भरता घटेगी।
  • वैश्विक स्थिति: NSG सदस्यता मजबूत, G20 में ऊर्जा नेतृत्व।
सरकारी दृष्टिकोण और भविष्य की राह

परमाणु ऊर्जा मंत्री ने इसे ‘भारत रूपांतरण’ का प्रतीक बताया, जो नेट-जीरो (2070) लक्ष्य को गति देगा। अगले चरण में निजी भागीदारों के लिए बोली प्रक्रिया शुरू होगी।

नागरिक परमाणु कानूनों का एकीकरण

इस विधेयक के तहत नागरिक परमाणु ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े सभी प्रमुख कानूनों को एकीकृत किया गया है। इसके साथ ही परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 और नागरिक परमाणु क्षति दायित्व अधिनियम, 2010 को निरस्त कर दिया गया है। सरकार का मानना है कि ये पुराने कानून निजी निवेश और तकनीकी साझेदारी के रास्ते में बाधा बन रहे थे, जिससे भारत में नागरिक परमाणु ऊर्जा का अपेक्षित विकास नहीं हो पा रहा था।

निजी क्षेत्र की भागीदारी का रास्ता साफ

नए कानून में पहली बार नागरिक परमाणु क्षेत्र में निजी क्षेत्र की नियंत्रित और नियामक ढांचे के भीतर भागीदारी का प्रावधान किया गया है। इससे देश और विदेश की कंपनियों को परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश, निर्माण और संचालन के अवसर मिलेंगे। सरकार का कहना है कि इससे न केवल पूंजी और अत्याधुनिक तकनीक आएगी, बल्कि परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता में भी तेज़ी से वृद्धि होगी।

सुरक्षा और दायित्व व्यवस्था में बदलाव

विधेयक में परमाणु सुरक्षा मानकों को और अधिक मज़बूत करने पर विशेष ज़ोर दिया गया है। साथ ही, परमाणु दुर्घटना की स्थिति में दायित्व से जुड़े प्रावधानों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप सरल और स्पष्ट बनाया गया है, ताकि निवेशकों का भरोसा बढ़े और पीड़ितों को समयबद्ध मुआवज़ा मिल सके।

स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु लक्ष्यों को समर्थन

सरकार का कहना है कि यह विधेयक भारत के स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लक्ष्यों के अनुरूप है। परमाणु ऊर्जा को कार्बन-रहित और भरोसेमंद ऊर्जा स्रोत के रूप में विकसित कर देश की बढ़ती ऊर्जा मांग को पूरा करने की योजना है।

भारत के ऊर्जा भविष्य के लिए अहम कदम

विशेषज्ञों के अनुसार, शांति विधेयक, 2025 से भारत का नागरिक परमाणु क्षेत्र अधिक प्रतिस्पर्धी, पारदर्शी और निवेश-अनुकूल बनेगा। इससे ऊर्जा सुरक्षा मज़बूत होगी, आयात पर निर्भरता घटेगी और भारत को दीर्घकालिक रूप से आत्मनिर्भर ऊर्जा राष्ट्र बनाने में मदद मिलेगी।

सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह कानून परमाणु ऊर्जा के केवल शांतिपूर्ण उपयोग तक सीमित रहेगा और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों का पूरी तरह पालन किया जाएगा।

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