नई दिल्ली, May 27, (Political Insight) : सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को चुनाव आयोग द्वारा कराए गए मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि SIR स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक आवश्यकता को बनाए रखने की प्रक्रिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत SIR कराने का अधिकार प्राप्त है, जिसे जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के प्रावधानों के साथ पढ़ा जाना चाहिए।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने दिया फैसला
यह फैसला चीफ जस्टिस सुर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने बिहार में चुनाव आयोग द्वारा कराए गए SIR को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनाया। कोर्ट ने माना कि SIR प्रक्रिया का उद्देश्य स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना है और इसका चुनावी पारदर्शिता से सीधा संबंध है। सुप्रीम कोर्ट ने SIR प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। यह प्रक्रिया बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल में पूरी हो चुकी है, जबकि उत्तर प्रदेश, गुजरात और राजस्थान समेत कई राज्यों में अभी जारी है।
बिहार चुनाव के बाद दायर की गई थी याचिका
गौरतलब है कि पिछले वर्ष जून में कई याचिकाएं दायर की गई थीं, जब चुनाव आयोग ने बिहार में SIR कराने का निर्णय लिया था। याचिकाकर्ताओं में योगेंद्र यादव, महुआ मोइत्रा, मनोज झा, केसी वेणुगोपाल, सुप्रिया सुले शामिल थीं। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि SIR मतदाता सूची संशोधन से जुड़े वैधानिक ढांचे को बदल देता है और यह NRC जैसी प्रक्रिया बन सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने ECI को दिए महत्वपूर्ण निर्देश
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने SIR की वैधता बरकरार रखते हुए चुनाव आयोग को महत्वपूर्ण निर्देश भी दिए। अदालत ने कहा कि जिन लोगों के नाम इस आधार पर मतदाता सूची से हटाए गए हैं कि वे भारतीय नागरिक नहीं हैं, उनके मामलों को चार सप्ताह के भीतर नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत सक्षम प्राधिकारी को भेजा जाए।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगले विधानसभा या स्थानीय निकाय चुनाव से पहले संबंधित मामलों पर निर्णय लिया जाए और प्रभावित व्यक्तियों को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि यदि चुनाव आयोग को यह पता चलता है कि संबंधित व्यक्ति भारतीय नागरिक है, तो उसका नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल किया जाए।