नई दिल्ली,6 अप्रैल (Political Insight)- सरकार भले ही यह दावा कर रही हो कि देश में LPG की कोई कमी नहीं है और 5 किलोग्राम वाले छोटे सिलेंडरों की आपूर्ति बढ़ा दी गई है, लेकिन जमीनी स्तर पर कई सवाल अब भी खड़े हो रहे हैं। बढ़ती मांग और अंतरराष्ट्रीय हालात के बीच आम लोगों की चिंता कम होने के बजाय कहीं न कहीं बनी हुई है।
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के मुताबिक, 23 मार्च से अब तक करीब 6.6 लाख छोटे सिलेंडर बेचे गए हैं। सरकार इसे अपनी आपूर्ति व्यवस्था की सफलता के रूप में पेश कर रही है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह आंकड़ा बढ़ती जरूरत का संकेत भी हो सकता है- यानी लोग अब मजबूरी में छोटे सिलेंडर की ओर रुख कर रहे हैं।
दरअसल, छोटे LPG सिलेंडरों को बिना पता-प्रमाण के उपलब्ध कराना एक राहत जरूर है, खासकर प्रवासी मजदूरों और किराएदारों के लिए। लेकिन इनकी कीमत बाजार दर पर होने के कारण यह विकल्प हर किसी के लिए सस्ता नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह सुविधा वास्तव में गरीब और मध्यम वर्ग के लिए कारगर है या सिर्फ एक अस्थायी समाधान?
सरकार ने 4 अप्रैल को 51 लाख से ज्यादा सिलेंडर सप्लाई करने और 95% ऑनलाइन बुकिंग का हवाला देकर स्थिति को सामान्य बताया है। हालांकि, कई उपभोक्ता अब भी डिलीवरी में देरी और स्थानीय स्तर पर उपलब्धता को लेकर शिकायत करते रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में तो डिजिटल बुकिंग की सुविधा भी पूरी तरह प्रभावी नहीं हो पाई है।
पश्चिम एशिया संकट और असली चिंताः-
ज़ाहिर है कि सरकार लगातार यह भरोसा दिला रही है कि पश्चिम एशिया में तनाव का भारत की ईंधन आपूर्ति पर कोई असर नहीं पड़ेगा। लेकिन हकीकत यह है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस क्षेत्र पर काफी हद तक निर्भर है। ऐसे में अगर हालात और बिगड़ते हैं, तो आने वाले समय में कीमतों और आपूर्ति दोनों पर असर पड़ सकता है।
PNG पर जोर, लेकिन रफ्तार धीमीः-
सरकार पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) को बढ़ावा देने की बात जरूर कर रही है, लेकिन अभी तक सिर्फ 3.6 लाख घरों तक ही यह सुविधा पहुंच पाई है, जबकि देश की आबादी के मुकाबले यह आंकड़ा बेहद कम है। नए कनेक्शनों के लिए आवेदन जरूर आए हैं, लेकिन जमीन पर इसका विस्तार अपेक्षा के अनुसार तेज नहीं दिखता।
कालाबाजारी पर कार्रवाई-क्या पर्याप्त है?
आपको बता दे कि सरकार ने 50 हजार सिलेंडर जब्त करने और 36 एजेंसियों के लाइसेंस रद्द करने की जानकारी दी है। यह कार्रवाई सख्ती का संकेत देती है, लेकिन यह भी सवाल उठता है कि अगर स्थिति पूरी तरह सामान्य है, तो इतनी बड़ी संख्या में कालाबाजारी और जमाखोरी क्यों सामने आ रही है?
महंगाई के इस दौर में रसोई गैस की कीमत पहले से ही आम आदमी की जेब पर भारी पड़ रही है। ऐसे में छोटे सिलेंडर का विकल्प जरूर दिया गया है, लेकिन यह हर किसी के लिए किफायती नहीं है। कई परिवार अब भी गैस के इस्तेमाल में कटौती करने या वैकल्पिक ईंधन अपनाने को मजबूर हैं।
जब हम बात करते है सरकार के दावों और आंकड़ों के बीच जमीनी सच्चाई की तो यह थोड़ी अलग नजर आती है। आपूर्ति बढ़ाने और निगरानी सख्त करने के कदम जरूरी हैं, लेकिन आम लोगों की असल चिंता-महंगाई और पहुंच अब भी पूरी तरह दूर नहीं हुई है। ऐसे में जरूरत है कि सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस और दीर्घकालिक समाधान पर ज्यादा ध्यान दिया जाए।