नई दिल्ली:– लोकसभा ने ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ से जुड़े महत्वपूर्ण विधेयकों की समीक्षा कर रही संयुक्त संसदीय समिति (JPC) का कार्यकाल बढ़ाने को मंजूरी दे दी है। यह अवधि अब संसद के मानसून सत्र 2026 के अंतिम सप्ताह के पहले दिन तक बढ़ा दी गई है। सदन ने यह प्रस्ताव ध्वनि मत से पारित किया।
आपको बता दे कि समिति के अध्यक्ष P.P चौधरी ने संविधान (संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्र शासित प्रदेश अधिनियम (संशोधन) विधेयक, 2024 की विस्तृत समीक्षा के लिए समय बढ़ाने का प्रस्ताव रखा था। इस पर सरकार का कहना है कि यह विषय व्यापक और जटिल है, जिसके लिए सभी पक्षों से गहन विचार-विमर्श आवश्यक है।
क्या है ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ प्रस्ताव?
‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ का अर्थ है कि लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएं। वर्तमान व्यवस्था में अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग समय पर चुनाव होते हैं, जिससे बार-बार चुनावी प्रक्रिया और आचार संहिता लागू होती है।
इस पर सरकार के तर्क
केंद्र सरकार का मानना है कि एक साथ चुनाव कराने से,
• चुनावी खर्च में भारी कमी आएगी
• प्रशासनिक और सुरक्षा संसाधनों पर दबाव कम होगा
• बार-बार लागू होने वाली आचार संहिता से विकास कार्यों में होने वाली बाधाएं घटेंगी
विपक्ष की आपत्तियाः-
हालांकि, इस प्रस्ताव को लेकर विपक्षी दलों ने कई सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि,
• इससे संघीय ढांचे पर असर पड़ सकता है
• राज्यों की राजनीतिक स्वतंत्रता सीमित हो सकती है
• यदि किसी सरकार का कार्यकाल बीच में खत्म होता है तो स्थिति जटिल हो सकती है
JPC की भूमिका और आगे की प्रक्रियाः-
गौरतलब है कि संयुक्त संसदीय समिति का काम इन विधेयकों के सभी पहलुओं-संवैधानिक, कानूनी और व्यावहारिक- का परीक्षण करना है। समिति विभिन्न राजनीतिक दलों, विशेषज्ञों और हितधारकों से राय लेकर अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी। सूत्रों के अनुसार, समिति पहले ही कई बैठकों में इस मुद्दे पर चर्चा कर चुकी है और अब विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने के लिए अतिरिक्त समय की आवश्यकता बताई गई है।
अब JPC अपनी रिपोर्ट मानसून सत्र 2026 तक संसद के समक्ष पेश करेगी। इसके बाद सरकार इस रिपोर्ट के आधार पर विधेयकों में संशोधन कर सकती है या उन्हें पारित कराने की दिशा में आगे बढ़ सकती है।
विश्लेषकों का मानना है कि ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ जैसे बड़े चुनावी सुधार को लागू करना आसान नहीं होगा, क्योंकि इसके लिए संविधान में व्यापक संशोधन और राज्यों की सहमति जरूरी होगी।
फिलहाल, इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस जारी है और आने वाले समय में यह देश की चुनावी प्रणाली को प्रभावित करने वाला एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।
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