अवामी लीग पर प्रतिबंध को लेकर अध्यादेश की वैधता पर उठे सवाल

अवामी लीग पर प्रतिबंध को लेकर अध्यादेश की वैधता पर उठे सवाल

ढाकाः- बांग्लादेश की अपदस्थ पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के पुत्र सजीब वाजेद ने अवामी लीग पर लगाए गए प्रतिबंध के संदर्भ में अंतरिम सरकार द्वारा जारी अध्यादेश की वैधता पर प्रश्न उठाए हैं। उन्होंने कहा कि BNP-नेतृत्व वाली नई सरकार के पास इस अध्यादेश पर निर्णय लेने के लिए 30 दिनों की संवैधानिक समय-सीमा है।

वाजेद ने अपने बयान में कहा कि अंतरिम प्रशासन ने एंटी टेररिज्म एक्ट 2009 में संशोधन करने के लिए एक अध्यादेश जारी किया है। इस संशोधन के तहत सरकार को किसी भी राजनीतिक दल की गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार मिल गया। इसी प्रावधान के आधार पर एस.आर.ओ. 137-एआईएन/2025 जारी कर आवामी लीग के खिलाफ कार्रवाई की गई है।

अनुच्छेद 93(2) का हवालाः-

वाजेद ने बांग्लादेश के संविधान के अनुच्छेद 93(2) का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी भी अध्यादेश को नई सरकार के गठन के बाद संसद के पहले सत्र में पेश करना अनिवार्य है। यदि संसद 30 दिनों के भीतर उसे कानून के रूप में पारित नहीं करती, तो वह स्वतः निरस्त हो जाएगा।

उनके अनुसार, BNP-नेतृत्व वाली सरकार के सामने दो विकल्प हैं—या तो वह अध्यादेश को समाप्त होने दे, या उसे संसद से पारित कर स्थायी कानून का रूप दे।
वाजेद ने चेतावनी दी कि यदि संसद संशोधन को वर्तमान स्वरूप में मंजूरी देती है, तो किसी राजनीतिक दल को “इकाई” के रूप में प्रतिबंधित करने और निर्वाचन आयोग द्वारा पंजीकरण रद्द करने जैसी कार्रवाइयां न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकती हैं।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि आतंकवाद-रोधी कानून का इस प्रकार “असाधारण उपयोग” लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। वहीं, यदि नई सरकार अध्यादेश को समाप्त होने देती है, तो इसे अंतरिम प्रशासन की कठोर नीतियों से दूरी बनाने और बहुदलीय लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा को बहाल करने के संकेत के रूप में देखा जाएगा।

राजनीतिक पृष्ठभूमिः-

गौरतलब है कि आवामी लीग और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) 1990 के दशक की शुरुआत में संसदीय लोकतंत्र की बहाली के बाद से बांग्लादेश की दो प्रमुख राजनीतिक शक्तियां रही हैं। ऐसे में किसी बड़े राजनीतिक दल पर प्रतिबंध का निर्णय न केवल कानूनी बल्कि व्यापक राजनीतिक महत्व भी रखता है।
अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि संसद इस अध्यादेश पर क्या रुख अपनाती है और इसका बांग्लादेश की राजनीतिक दिशा पर क्या प्रभाव पड़ता है।

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