नई दिल्लीः- लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने नैतिक आधार पर एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए कहा है कि वे आपने विरुद्ध लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय होने तक सदन की कार्यवाही में शामिल नहीं होंगे। यह कदम उन्होंने संसदीय परंपराओं की मर्यादा बनाए रखने और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उठाया है।
गौरतलब है कि विपक्षी दलों ने मंगलवार को लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस लोकसभा के महासचिव को सौंपा। लोकसभा सचिवालय के सूत्रों के अनुसार, नोटिस की वैधता और नियमों के अनुरूपता की जांच की जाएगी। इसके बाद ही इसे सदन की कार्यवाही के लिए सूचीबद्ध करने पर निर्णय लिया जाएगा।
सूत्रों के मुताबिक, इस प्रस्ताव पर कांग्रेस, DMK, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और वामपंथी दलों सहित विपक्षी गठबंधन के कुल 118 सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। हालांकि तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसदों ने इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, जिससे विपक्ष की एकजुटता को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।
जब हम बात करते है संसदीय नियमों की तो इसके अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए सदन के न्यूनतम 50 सदस्यों का समर्थन आवश्यक होता है। यदि प्रस्ताव वैध पाया जाता है तो इसे सदन में चर्चा और मतदान के लिए सूचीबद्ध किया जाता है। प्रस्ताव पारित होने के लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का बहुमत जरूरी होता है।
यदि प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो अध्यक्ष को पद छोड़ना पड़ता है। ऐसे में उपाध्यक्ष सदन की कार्यवाही संचालित करते हैं या आवश्यकतानुसार अन्य व्यवस्था की जाती है।
राजनीतिक पृष्ठभूमिः-
जब हम इस प्रस्ताव के राजनीतिक पृष्ठभूमि को देखते है तो हम पाते है कि हाल के सत्र के दौरान सदन में हुए तीखे घटनाक्रम और विपक्ष के आरोपों के बाद यह कदम उठाया गया है। विपक्ष का आरोप है कि सदन की कार्यवाही के संचालन में पक्षपात बरता गया, जबकि सत्तापक्ष इन आरोपों को निराधार बता रहा है।
ओम बिरला का सदन की कार्यवाही से स्वयं को अलग रखने का निर्णय इस लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है कि इससे प्रस्ताव पर होने वाली प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल न उठें। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि महासचिव द्वारा जांच के बाद इस प्रस्ताव को कब और किस रूप में सदन में लाया जाता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम बजट सत्र के दौरान सियासी तापमान को और बढ़ा सकता है तथा आने वाले दिनों में संसद की कार्यवाही पर इसका व्यापक असर देखने को मिल सकता है।