अरावली एक समृद्ध विरासत या फिर सियासत, कानून और पर्यावरण के टकराव का केंद्र ?

अरावली एक समृद्ध विरासत या फिर सियासत, कानून और पर्यावरण के टकराव का केंद्र ?

अरावली पर्वत श्रृंखला भूजल रिचार्ज करने, जंगलों और वन्यजीवों को आश्रय देने और करोड़ों लोगों को स्वच्छ हवा उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाती है। उत्तर भारत की यह प्राचीन पर्वतमाला जिसका विस्तार लगभग 670 किमी है जो सिर्फ पत्थरों और पहाड़ियों का समूह नहीं, बल्कि दिल्ली, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच है। यही अरावली थार मरुस्थल की रेत, लू और धूल भरी आंधियों को उपजाऊ क्षेत्रों तक पहुंचने से रोकती है।

अरावली से जुड़ा मौजूदा विवाद सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुलपाड़ बनाम भारत संघ (1995) मामले से जुड़ा है।

इस केस में कोर्ट ने 1996 में ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा था कि—

“जंगल की पहचान केवल सरकारी अधिसूचना से नहीं, बल्कि उसके प्राकृतिक स्वरूप, वनस्पति और पारिस्थितिक महत्व से तय होगी।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि देश के किसी भी हिस्से में वन भूमि पर गैर-वन गतिविधियां बिना अनुमति नहीं हो सकतीं। इसी फैसले के आधार पर अरावली समेत कई क्षेत्रों में खनन पर रोक और सख्त निगरानी शुरू हुई।

2018 और 2022 की सुनवाइयों में कोर्ट ने हरियाणा और राजस्थान सरकारों को फटकार लगाते हुए यहा तक कहा था कि अरावली में अवैध खनन संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) का उल्लंघन है।

लेकिन आज वही अरावली फिर सियासत, कानून और पर्यावरण के टकराव का केंद्र बन गई है। सुप्रीम कोर्ट में सरकार की ओर से दायर एक जवाब के बाद राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली तक विरोध तेज हो गया है। सोशल मीडिया पर ‘#SaveAravalli’ अभियान चल रहे हैं और सड़कों पर प्रदर्शन की तैयारी है। यह बहस अब सिर्फ कानूनी परिभाषा तक सीमित नहीं रही, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ गई है।

राजनीति और सामाजिक विरोध तेज

सरकार के जवाब के बाद राजस्थान समेत कई राज्यों में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने ‘Save Aravalli’ अभियान के तहत सरकार की नीति पर सवाल उठाए हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रस्तावित नई परिभाषा पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि अरावली को केवल ऊंचाई या तकनीकी मानकों से नहीं, बल्कि उसके पर्यावरणीय महत्व के आधार पर देखा जाना चाहिए। उन्होंने अभियान के समर्थन में अपनी सोशल मीडिया प्रोफाइल तस्वीर बदलकर प्रतीकात्मक विरोध भी दर्ज कराया।

गहलोत का कहना है कि अरावली उत्तर भारत के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा दीवार है। यदि छोटी पहाड़ियों और गैपिंग एरिया को खनन के लिए खोल दिया गया, तो मरुस्थलीकरण तेज होगा, तापमान खतरनाक स्तर तक बढ़ेगा और प्रदूषण नियंत्रण से बाहर हो जाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि अरावली की चट्टानें भूजल रिचार्ज का मुख्य आधार हैं और इनके नष्ट होने से भविष्य में पानी की गंभीर किल्लत, वन्यजीवों का लुप्त होना और पारिस्थितिकी संतुलन का बिगड़ना तय है।

सरकार का पक्ष और नई परिभाषा

सुप्रीम कोर्ट में दायर जवाब में सरकार ने कहा है कि अरावली की पहचान और संरक्षण की सीमा तय करने के लिए ऊंचाई को आधार बनाया जाना चाहिए। प्रस्ताव के अनुसार, स्थानीय भू-स्तर से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियां ही अरावली मानी जाएंगी। 100 मीटर से कम ऊंचाई वाले टीले, छोटी पहाड़ियां और गैपिंग एरिया को इस परिभाषा से बाहर रखा जाएगा।

सरकार का दावा है कि यह परिभाषा वैज्ञानिक आधार पर तय की गई है और इससे संरक्षण तथा विकास के बीच संतुलन बनाया जा सकेगा। केंद्र का तर्क है कि अब तक स्पष्ट और सीमित परिभाषा के अभाव में नीतिगत भ्रम बना हुआ था, जिसे दूर करना आवश्यक था।

दिलचस्प तथ्य यह है कि राजस्थान में 2002 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कार्यकाल में भी 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची पहाड़ियों को अरावली मानने की व्यवस्था स्वीकार की गई थी और उसी आधार पर खनन गतिविधियां चल रही थीं।

विवाद की जड़ क्या है?

फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) ने लगभग 10 हजार पहाड़ियों को अरावली का हिस्सा बताते हुए वहां खनन रोकने की सिफारिश की थी। इसके विरोध में राजस्थान सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची और तर्क दिया कि इससे राज्य की लगभग सभी खनन गतिविधियां बंद हो जाएंगी। कोर्ट ने नए कानून और नियम बनाने के निर्देश दिए, साथ ही पुराने खनन कार्यों को शर्तों के साथ जारी रखने की अनुमति दी।

ताजा जानकारी के अनुसार, करीब 8 हजार स्थानों पर फिर से खनन गतिविधियों को अनुमति मिल चुकी है, जबकि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित समिति को नई नियमावली तैयार करने में दो साल तक लग सकते हैं।

नई परिभाषा क्यों मानी जा रही है खतरनाक

पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आरोप है कि खनन के लिए कई जगहों पर 100 मीटर या उससे ऊंची पहाड़ियों को कागजों में 60 या 80 मीटर दिखाकर अनुमति ली जाती रही है। इसके लिए अल्टीमीटर जैसे उपकरणों का इस्तेमाल किया गया, जबकि सरकार खुद कई बार कह चुकी है कि पहाड़ों की ऊंचाई ऐसे नहीं मापी जा सकती। अलवर और सिरोही में ऐसे मामलों में मुकदमे भी दर्ज हुए। 2009 से 2015 के बीच इस तरह की सैकड़ों परमिशन दी गईं, जिन पर जांच तो हुई, लेकिन कई मामलों में अदालत से राहत मिल गई।

सड़कों पर उतरने की तैयारी

एनएसयूआई राजस्थान ने सरकार के फैसलों के विरोध में सड़कों पर उतरने का ऐलान किया है। संगठन के अनुसार, 26 दिसंबर को जयपुर में ‘अरावली बचाओ पैदल मार्च’ आयोजित किया जाएगा। पर्यावरण संगठनों और विपक्ष का कहना है कि अरावली की 80–90 प्रतिशत पहाड़ियां 100 मीटर से कम ऊंचाई की हैं, जिससे नई परिभाषा लागू होने पर खनन और निर्माण गतिविधियों के रास्ते खुल जाएंगे।

आंकड़े जो चिंता बढ़ाते हैं

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, एफएसआई के एक आंतरिक आकलन में सामने आया है कि राजस्थान के 15 जिलों में फैली 12,081 अरावली पहाड़ियों में से सिर्फ 1,048 पहाड़ियां ही 100 मीटर से अधिक ऊंची हैं। यानी नई परिभाषा लागू होने पर अरावली का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कानूनी रूप से अरावली नहीं माना जाएगा।
इसी आशंका के चलते स्थानीय लोग, पर्यावरण संगठन और राजनीतिक दल इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। कांग्रेस सांसद सोनिया गांधी ने भी इसे अरावली के लिए ‘डेथ वारंट’ करार देते हुए कहा है कि पहले से अवैध खनन से क्षतिग्रस्त इन पहाड़ियों पर यह फैसला विनाश को और तेज करेगा।

कुल मिलाकर, अरावली को लेकर उठी यह बहस विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की असली परीक्षा बन गई है। सवाल यह नहीं कि पहाड़ कितने ऊंचे हैं, बल्कि यह है कि क्या भविष्य की कीमत पर आज का विकास स्वीकार्य है।

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