मुंबई की एनआईए कोर्ट ने 2008 मालेगांव ब्लास्ट केस में सभी 7 आरोपियों को बरी कर दिया। इनमें बीजेपी सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुरऔर पूर्व सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित शामिल हैं। कोर्ट ने कहा कि “आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता”, लेकिन मात्र शक के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती।
न्यायालय ने माना कि बम बनाने, आरडीएक्स लाने या घटनास्थल से आरोपी का सीधा संबंध साबित नहीं हुआ। गवाहों के बयान बदले गए और फॉरेंसिक साक्ष्य कमजोर थे।
2008 में मालेगांव (महाराष्ट्र) में धमाके में 6 लोगों की मौत और 100 से अधिक घायल हुए थे। 17 साल तक चली सुनवाई में 323 गवाहों और 10,000+ सबूतों पर विचार किया गया।
यह फैसला “भगवा आतंकवाद” की थ्योरी को लेकर भी सियासी बहस का केंद्र बन गया है।
मुख्य हाइलाइट्स –
- – एनआईए की विशेष कोर्ट ने सभी 7 आरोपियों को बरी किया, जिसमें पूर्व सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित शामिल हैं।
- – कोर्ट ने कहा: “आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता”, लेकिन सिर्फ ‘संशय’ पर दोष नहीं किया जा सकता; ठोस कानूनी प्रमाण न होने पर आरोप सिद्ध न हुआ।
- – UAPA की सुरक्षा आदेश नियमों के अनुसार नहीं थी, इसलिए कानून लागू नहीं हो पाया।
- – घटना की प्रारंभिक जांच ATS ने की थी, बाद में NIA ने केस संभाला। ATS व NIA की रिपोर्टों में कई विसंगतियाँ और गवाहों के बयान वापस लेने की घटनाएँ सामने आईं।
पृष्ठभूमि –
- – मामला 29 सितंबर 2008 का है, जब मालेगांव में एक बम धमाका हुआ जिसमें 6 लोगों की मौत और 100 से अधिक घायल हुए।
- – 323 गवाह और 10,800 सबूतों पर केस चला, लेकिन जांच में चेसिस नंबर मिटा हुआ पाया गया, मौलिक forensics साक्ष्य कमजोर सामने आए और कई गवाहों ने बयान बदल दिए।
- – अदालत ने कहा कि प्रज्ञान ठाकुर का बाइक मालिकाना हालात में स्पष्ट साबित नहीं हुआ, और पुरोहित के खिलाफ RDX लाने या बम बनाने का कोई विश्वसनीय सबूत न मिला।