नई दिल्लीः- देश में चुनावी भागीदारी और उम्मीदवारों की गुणवत्ता को लेकर चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि अगर मतदान को अनिवार्य किया जाए तो अधिक लोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेंगे, बेहतर उम्मीदवार सामने आएंगे और ‘नोटा’ (NOTA) का विकल्प धीरे-धीरे अप्रासंगिक हो सकता है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान कहा कि नोटा का उद्देश्य मतदाताओं को यह संदेश देना था कि यदि वे किसी भी उम्मीदवार से संतुष्ट नहीं हैं तो वे अपनी असहमति दर्ज कर सकते हैं। अदालत ने अनुभव के आधार पर यह भी कहा कि पिछले करीब एक दशक में बहुत कम मतदाताओं ने इस विकल्प का इस्तेमाल किया है।
क्या है पूरा मामला?
यह सुनवाई विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी की एक जनहित याचिका(PIL) पर हो रही थी। याचिका में मांग की गई थी कि जिन सीटों पर सिर्फ एक ही उम्मीदवार चुनाव मैदान में हो, वहां नोटा को भी एक “उम्मीदवार” की तरह माना जाए। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि इससे मतदाता खुलकर बता सकेंगे कि वे उस एकमात्र उम्मीदवार को स्वीकार करते हैं या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अगर नोटा को उम्मीदवार का दर्जा देना है तो इसके लिए पार्लियामेंट को रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल एक्ट-1951 में संशोधन करना होगा, जो संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है।
बहस के मुख्य तर्कः-
वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने दलील दी कि अगर नोटा को एक औपचारिक उम्मीदवार की तरह रखा जाए तो धनबल और प्रभाव का इस्तेमाल कर विरोधियों को मैदान से हटाने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगेगा।
वहीं, अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने सवाल उठाया कि जब मतदान स्वयं मौलिक अधिकार नहीं है, तो अनुच्छेद 32 के तहत इस तरह की याचिका कितनी स्वीकार्य है। उन्होंने कहा कि कानून में बदलाव का फैसला संसद को करना चाहिए, न कि न्यायपालिका को।
सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि नोटा कोई नामांकित व्यक्ति नहीं है, इसलिए उसे कानून के तहत “उम्मीदवार” नहीं माना जा सकता। उसके मुताबिक, नोटा केवल असहमति जताने का एक विकल्प है, कोई कानूनी पहचान वाला प्रत्याशी नहीं।
मतदान को लेकर अदालत ने क्या टिप्पणी कीः-
सुनवाई के दौरान पीठ ने एक सामाजिक पहलू पर भी ध्यान दिलाया। अदालत ने कहा कि अक्सर शहरों में रहने वाले पढ़े-लिखे और संपन्न लोग मतदान के दिन घर से बाहर नहीं निकलते, जबकि ग्रामीण इलाकों में चुनाव का दिन किसी त्योहार जैसा होता है और लोग गर्व के साथ वोट डालने जाते हैं।
यह टिप्पणी कहीं न कहीं लोकतंत्र में नागरिक जिम्मेदारी की ओर भी इशारा करती है।
नोटा कब और क्यों आया?
आपको बता दे कि ‘नोटा’ का विकल्प 2013 में सुप्रीम कोर्ट के एक अहम फैसले के बाद लागू हुआ था, जिसके तहत चुनाव आयोग को EVM में (NOTA) का विकल्प शामिल करने का निर्देश दिया गया था। इसका मकसद था मतदाताओं को यह अधिकार देना कि वे सभी उम्मीदवारों को नकार सकें और अपनी असहमति को दर्ज कर सकें।
नोटा को एक तरह से लोकतांत्रिक “सुरक्षा वाल्व” माना गया- एक ऐसा माध्यम, जिससे जनता राजनीतिक दलों को संदेश दे सके कि बेहतर और साफ छवि वाले उम्मीदवार उतारे जाएं। हालांकि मौजूदा नियमों के तहत, अगर नोटा को सबसे ज्यादा वोट भी मिल जाएं, तब भी दूसरे नंबर पर रहे उम्मीदवार को विजेता घोषित किया जाता है।
व्यापक बहस की शुरुआतः-
सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी ने दो अहम सवालों को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है- क्या भारत में मतदान अनिवार्य होना चाहिए? और क्या नोटा को और प्रभावी बनाया जाना चाहिए?
हमें यह ध्यान रखना होगा कि लोकतंत्र केवल चुनाव कराने से नहीं, बल्कि लोगों की सक्रिय भागीदारी से मजबूत होता है। अदालत की यह टिप्पणी इसी मूल भावना की याद दिलाती है।