तख्ता पलट का एक साल बांग्लादेश को क्या मिला

तख्ता पलट का एक साल बांग्लादेश को क्या मिला

तारीख थी 5 अगस्त, ठीक एक साल पहले बांग्लादेश में व्यापक हिंसा और विद्रोह के बीच पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा था। भले ही हसीना ने देश छोड़ दिया लेकिन अब एक साल बाद भी बांग्लादेश राजनीतिक तौर पर अस्थिर ही नजर आ रहा है।

बांग्लादेश में शेख हसीना का पतन होने के बाद नए बांग्लादेश के नारे गूंज रहे थे। हसीना की सरकार का तख्तापलट होने के बाद माना जा रहा था कि यहां नई व्यवस्था लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरेगी। हिंसा के भंवर में फंसे देश की कमान नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के हाथ आई लेकिन नया बांग्लादेश तो कोसों दूर अब पुराना बांग्लादेश भी वैसा नहीं है जो हसीना के कार्यकाल में था। बांगलादेश प्रतिस्पर्धी ताकतों के बीच बँटा हुआ दिखाई दे रहा है, जहाँ हिंसा, अराजकता और गहरे राजनीतिक मतभेदों के डर से बेहतर भविष्य की उम्मीदें धूमिल हो रही हैं। यह बांग्लादेशियों के लिए चिंता का विषय है, जिनमें से कई ने पिछले साल बदलाव की मांग के लिए अपनी जान जोखिम में डाल दी थी।

यह भारत के लिए भी चिंताजनक है, जो लंबे समय से बांग्लादेश का सबसे करीबी सहयोगी और साझेदार रहा है, और इन दिनों अक्सर ढाका के साथ टकराव की स्थिति में है। जानकारों का मानना है की पिछले साल बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से बेदखल करने के बाद प्रोफेसर यूनुस के शासन काल में जहां एक ओर बांग्लादेश में इस्लामिक कट्टरपंथियों और चरमपंथियों का दबदबा बढ़ा है, वहीं लोकतंत्र को बहाल करने के नाम पर आई सरकार खुद ही सत्ता में रहना चाहती है. यूनुस सरकार मनमाने ढंग से चुनाव करने पर तुली हुई है. पिछले साल जुलाई-अगस्त में राजनीतिक उथल-पुथल के बीच…

प्रधानमंत्री शेख हसीना का 15 साल का कार्यकाल समाप्त कर दिया गया। तख्तापलट की शुरुआत छात्रों द्वारा किए गए व्यापक विरोध-प्रदर्शनों से हुई. इसकी चिंगारी जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट के एक विवादास्पद फैसले से भड़की थी. इस फैसले के बाद 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दिग्गजों के वंशजों के लिए नौकरियों में 30 फीसदी आरक्षण दिया जाना था. 2018 में हसीना सरकार द्वारा आरक्षण व्यवस्था को खत्म करने के लिए लाए गए कानून को पलटने वाले इस फैसले ने छात्रों और युवा पेशेवरों के बीच भारी असंतोष को जन्म दिया. एक जुलाई 2025 को शांतिपूर्ण तरीके से शुरू हुए ये प्रदर्शन हिंसक सरकार विरोधी प्रदर्शनों में बदल गए, जिसका दमन करने के लिए हसीना सरकार ने पुलिस का सहारा लिया. इसमें कई छात्रों की मौत हो गई.

पांच अगस्त, 2024 को जब भीड़ ने प्रधानमंत्री आवास ‘गणभवन’ पर धावा बोल दिया और सरकारी इमारतों को लूट लिया, तो बांग्लादेश सेना के प्रमुख जनरल वकर-उज-जमान ने एक टेलीविजन संबोधन में हसीना के इस्तीफे की जानकारी देते हुए एक अंतरिम सरकार के गठन की घोषणा की.उन्होंने प्रभावी रूप से नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया.कुछ समय बाद नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस को अंतरिम सरकार का प्रमुख नियुक्त किया गया. हसीना, जिन्हें इस्तीफा देने के लिए केवल 45 मिनट का समय दिया गया था, अपनी बहन शेख रेहाना के साथ सेना द्वारा उपलब्ध कराए गए विमान से भारत आ गईं. उसके बाद से ही वो भारत में रह रही हैं. सत्ता संभालने के बाद यूनुस ने बांग्लादेश में लोकतंत्र को बहाल करने और देश में जल्द चुनाव करने का वादा किया था.

ह्यूमन राइट्स वॉच’ की एशिया मामलों की निदेशक मीनाक्षी गांगुली कहती हैं कि जो लोग एक साल पहले शेख हसीना की दमनकारी सत्ता के खिलाफ सड़कों पर उतरे थे, उनकी उम्मीदें अब भी अधूरी हैं। हसीना के खिलाफ हुए विद्रोह के दौरान सैकड़ों लोगों की मौत हुई है। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस थानों और सरकारी इमारतों में आग लगा दी। राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच खूनी संघर्ष भी हुआ। लेकिन, इतना सब होने के बाद भी सवाल वही है कि मिला क्या। यूनुस सरकार ने 11 सुधार आयोग बनाए हैं, जिनमें एक राष्ट्रीय सहमति आयोग भी शामिल है जो प्रमुख राजनीतिक दलों के साथ चुनाव प्रक्रिया पर काम कर रहा है।

लेकिन, अब तक चुनाव की समयसीमा और प्रक्रिया पर सहमति नहीं बन सकी है। महिलाओं और अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं। मनमाने ढंग से हिरासत में लिए जाने के आरोप सामने आ रहे हैं। विशेषकर, शेख हसीना के समर्थकों को निशाना बनाने के आरोप हैं। हसीना की पार्टी अवामी लीग पर प्रतिबंध है और पिछले एक साल में हिरासत में उसके 24 से अधिक समर्थकों की मौत हो चुकी है।

भावी सरकार और चुनाव प्रक्रिया में सुधारों के लिए राजनीतिक दलों के साथ काम कर रहा है। हालांकि आपसी विवाद के चलते अब तक कोई सहमति नहीं बन पाई है। देश में बीते एक वर्ष के दौरान राजनीतिक हिंसा की 92 प्रतिशत घटनाओं में पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी शामिल रही। जबकि कट्टरपंथी पार्टी जमात-ए-इस्लामी पांच प्रतिशत और छात्र आंदोलन से उपजी नेशनल सिटिजन पार्टी महज एक प्रतिशत घटनाओं में शामिल रही।

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