मिडल ईस्ट संकट: भारत ने शांति की अपील की

मिडल ईस्ट संकट: भारत ने शांति की अपील की
मिडल इस्ट जंग के मुहाने पर है, हज़ारों लोग मारे जा रहे हैं, हजारों बच्चे अनाथ हो रहे हैं, दो मुल्को की इस लड़ाई में आम जनता पिसती जा रही है जिसे इस बात से की फर्क नही पड़ता कि किसके पास कितनी सैन्य ताकत है, किसके पास कितने परमाणू बम हैं, कौन किस पर भारी है..
क्योंकि आम दन केवल दो वक्त की रोटी और अपने बच्चों के लिए दूध चाह रहा है… सत्ता पर काबिज़ हुकमरानों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। इजरायल-हमास के बीच शुरू हुई जंग में हिजबुल्ला के बाद अब आधिकारिक रूप से ईरान की भी एंट्री हो गई है। ईरान ने हिजबुल्ला चीफ हसन नसरल्लाह की मौत के बाद इजरायल पर बैलिस्टिक मिसाइलों से अटैक किया। हालांकि, इजरायली सेना ने अधिकतर मिसाइलों को आयरन डोम की मदद से नष्ट कर दिया। लेकिन, ईरान ने दावा किया कि उसकी अधिकतर मिसाइलें अपने लक्ष्य पर गिरीं।
ऐसा नही है कि इरान औऱ इजराईल के बीच की दुश्मनी सदियों पुरानी है, असल मे साल 1953 में ईरान में मोहम्मद रजा शाह का राज स्थापित हुआ। इसी के साथ ही ईरान और इजरायल के बीच आर्थिक, सैन्य व अन्य क्षेत्रों में आदान-प्रदान होने लगा। यही नहीं, ईरान से इजरायल को तेल दिया जाता था, जिसके बदले में ईरान को आधुनिक हथियार मिलते थे। लेकिन साल था 1979, ईरान में इस्लामिक क्रांति की वजह से राजशाही का अंत हुआ और ईरान में सब कुछ बदल गया। इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान ने इजरायल से सारे संबंधों को तोड़ दिया और उनके बीच दुश्मनी पनपने लगी।
ईरान एक इस्लामिक देश बन गया और अयातुल्ला अली खामेनेई ईरान के सर्वोच्च नेता बन गए। इस्लामिक क्रांति का परिणाम यह हुआ कि ईरान में इस्लामी कानून (शरिया) लागू हो गया और ईरान ने अमेरिका तथा पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों को सीमित कर दिया। चार दशक से अधिक समय के बाद भी दोनों देशों के बीच संबंध दुरुस्त नहीं हो पाए हैं। इधर भारत ने हालात को “मानवीय” त्रासदी बताते हुए कहा कि वह शत्रुता के बढ़ने से गंभीर रूप से चिंतित है, इससे क्षेत्र में शांति और सुरक्षा को खतरा है. विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि, “हम तत्काल तनाव कम करने, संयम बरतने, हिंसा से पीछे हटने और कूटनीति के रास्ते पर लौटने का आह्वान करते हैं. हम उभरती स्थिति पर करीबी नजर रख रहे हैं…
यह महत्वपूर्ण है कि क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता बनी रहे.” तनाव बढ़ रहा है लेकिन भारत के लिए ये परिक्षा की घड़ी है क्योंकि भारत के रिश्ते दोनों से ही प्रगाड़ है। इजरायल के साथ भारत के रणनीतिक संबंध हैं. इसके साथ उसने दशकों से रक्षा से लेकर टेक्नालॉजी तक कई क्षेत्रों में सहयोग किया है. पीएम मोदी ने 2018 में इजरायल का दौरा किया था. इजरायली पीएम नेतन्याहू के साथ उनकी पर्सनल केमिस्ट्री काफी अच्छी है. अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस के साथ-साथ इजरायल भी भारत को सबसे बड़ी रक्षा आपूर्ति करने वाले देशों में से एक है. वहीं ईरान की बात करें तो उसके विवादास्पद न्यूक्लियर प्रोग्राम को लेकर प्रतिबंध लगाए जाने से पहले भारत ईरान का दूसरा सबसे बड़ा तेल इम्पोर्टर था. चार साल से भारत ईरान से तेल नहीं खरीद सका है, लेकिन दोनों के बीच नजदीकियां बरकरार रही हैं. भारत और ईरान ने 2002 में एक रक्षा समझौता किया था. इस साल की शुरुआत में विदेश मंत्री एस जयशंकर ईरान की यात्रा पर गए थे. वहां भारत ने चाबहार बंदरगाह के निर्माण में निवेश किया है.
भारत हमास को आतंकवादी संगठन नहीं मानता है, इजरायल का दौरा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स पर एक पोस्ट में इसे “आतंकवादी कृत्य” बताया था. इसके जरिए भारत ने साफ संदेश दिया कि वह आतंकवाद के खिलाफ इजराइल के साथ है. ऐसे में भारत के इस रुख पर दुनिया की नज़रें हैं।                                            
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