कौन हैं चंपई सोरेन और बीजेपी के लिए क्या वो बन पाएंगे तारणहार

कौन हैं चंपई सोरेन और बीजेपी के लिए क्या वो बन पाएंगे तारणहार

चंपई सोरेन जेएमएम के कोल्हान क्षेत्र के सबसे बड़े नेता रहे हैं. जिनके सहारे बीजेपी अपनी चुनावी नैया पार लगाने में जुटी है। साल 1991 से विधायक बनते रहे हैं.
विधानसभा चुनाव से पहले झारखंड की राजनीति में अटकलों का बाजार गर्म है. झारखंड मुक्ति मोर्चा(Jharkhand Mukti Morcha) के वरिष्ठ नेता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन (Champai Soren) के बीजेपी में शामिल होने की संभावना जताई जा रही है. ऐसा इसलिए क्योंकि खुद चंपई ने सोशल मीडिया प इस बात के संकेत दे दिए। उन्होंने सोशल साइट एक्स पर लिखा था कि मेरे लिए सभी विकल्प खुले हुए हैं. साथ ही उन्होंने जेएमएम नेतृत्व पर अपमानित करने का आरोप लगाया था.

हालाकि झारखंड मुक्ति मोर्चा में कई बार विभाजन के बाद भी वो शिबू सोरेन के साथ डटे रहें थे. चंपई सोरेन कोल्हान क्षेत्र से आते हैं. संथाल परगना के बाद कोल्हान का क्षेत्र जेएमएम का गढ़ माना जाता है.

कोल्हन क्षेत्र जेएमएम का महत्वपूर्ण इलाका है. यहां 14 में से 11 सीटे जेएमएम के खाते में हैं. इस इलाके में चंपई सोरेन की जीत में अहम भूमिका रही है, इतना ही नहीं जो 2 सीटे कॉंग्रेस ने जीती वो भी जेएमएम से गठबंधन के साथ ही जीती थी। सो कुल मिलाकर यहां चंपई सोरेन फैक्टर को नकारा नही जा सकता। इतिहास गवाह रहा है कि कोल्हान में निर्मल महतो के दौर से ही जेएमएम की अच्छी पकड़ रही है. महतो वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा हमेशा से जेएमएम के साथ रहा है. शिबू सोरेन की आदिवासी वोट बैंक पर अपील रही है.

चंपई सोरेन के सामने सबसे बड़ी चुनौती आदिवासी वोट बैंक को जेएमएम के खाते से खींचकर बीजेपी की तरफ लाना होगा. यह काम बेहद कठिन होगा क्योंकि भारतीय जनता पार्टी को पिछले विधानसभा चुनाव में आदिवासियों के लिए सुरक्षित 28 सीटों में से महज 2 सीटों पर जीत मिली थी. जेएमएम को 19 सीटों पर जीत मिली थी. कांग्रेस को 6 सीटों पर बीजेपी को महज 2 सीटों पर जीत मिली थी. पिछले लोकसभा चुनाव में भी राज्य की सभी 5 एसटी आरक्षित सीटों पर बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा था. आदिवासी वोटर्स तेजी से बीजेपी से दूर गए हैं.

बीजेपी में चंपई का रास्ता कितना आसान

बीजेपी के पास राज्य में कई कद्दावर नेता हैं. बाबूलाल मरांडी पहले से ही राज्य में पार्टी के फेस के तौर पर कार्य कर रहे हैं. लोकसभा चुनाव में हार के बाद अर्जुन मुंडा भी राज्य में अपने लिए जगह तलाश रहे हैं. पूर्व मुख्यमंत्री और ओडिशा के राज्यपाल रघुवर दास और उनके गुट के नेता झारखंड की राजनीति में बेहद सक्रिय रहे हैं. मधु कोड़ा की पत्नी गीता कोड़ा भी लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी में शामिल हुई थी. सीता सोरेन ने भी लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी का दामन थामा था. ऐसे में इतने मजबूत नेताओं और पावर सेंटर के बीच अपने लिए बीजेपी में स्पेस बनाना चंपई सोरेन के लिए आसान नहीं

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